कभी हो नहीं सके विलेय,
जैसे घुलती है हवा,
सासों के साथ लहू में,
आवाज खोती हैं लहरें,
जैसे किनारों से टकराकर,
मैं खो नहीं सका ऐसे, रिश्तों के भंवर में।
रिश्ते, जो बुलाते हैं आज भी
लिए हाथों में शर्तों की लंबी फेहरिस्त,
कि तुम मानोगे इसे,
अपने सारे निज को भूलकर,
कि तुम्हारी मान्यताएं और तुम,
बंध सको उनके बंधनवार में,
तो आओ, स्वागत है तुम्हारा
एक अजब से खेल में।
Monday, 7 April 2008
रिश्ते और मैं
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मेरी कविता
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