Tuesday, 1 April 2008

मप्र की माया

अहम् बरअहम् अम्बेडकर मध्यप्रदेश के ब्राह्मणों मैं एन दिनों अजीब अकुलाहट है। ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकर बड़ी साबित करने की होड़। अकेला ब्रह्मण ही क्यों पुरा सवर्ण वर्ग ही एस दोड मैं सामिल है, ब्रह्मण कुछ ज्यादा। उप मैं जब से मायावती का सोशल फार्मूला हित हुआ है , तमाम प्रदेशों का भाईचारा राजनितिक गदिंत के एस अब्सर को लपक लेने की फिराक मैं है। मप इससे अछुता नही है। मप के कस्बों की दिबरे एन दिनों माया और उनके भाईचारा गन मैं रंगी हुई हैं ।मायावती को सामाजिक सद्भाव का देवदूत बताते यह संदेश स्वरण वर्ग को सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए सुनहरे रस्ते नजर आ रहा है। जातिवादी सम्मेलन मैं भीड़ का उन्माद to देखते ही बनता है । पंडितों के बीच रातों रात नए नेता प्रगट हो गए । यह वो लोग थे जो कभी अपने कसबे और शहर मैं छोटी-मोटी राजनीत किया करते हैं । इनके पास पैसे की ताकत है और मायावती उन्हें एक अब्सर दिखाती दे रही है । इन लोगों के बीच आज एक बात नारे की तरह प्रचलित हो रही है । अहम् ब्रह्म अम्बेडकर । सबसे बडा अम्बेडकरवादी होने का दिखावा । सबसे बडा दलित होने की खव्हिश । इनमें से बहुत कम को ही अम्बेडकर और उनके सिधान्तो से कोई लेना देना हो। बहुतेरे तो इस सबसे वास्ता ही नही रखते। उनके लिए अम्बेडकर होने का मतलब है दलितों के साथ उठाना बैठना और उनके हितैषी होने का ढोंग करना। उनके लिए दलित एक वोट बैंक है जो जातीयता के इस उन्मादी युग मैं उनकी जात के सत्ता तक पहुँचने की उनकी क्वाहिश को पूरा कर सकता है। मध्यप्रदेश के जातिगत आंकडो की बात करें तो यहाँ ब्रह्मण के सिथति यूपी से अलग है। प्रदेश की ३०० से अधिक विधानसभा मैं ३० फीसदी भी एसी नही हैं जहाँ ब्रह्मण अकेले अपने दम पर कोई सीट जीता सके। प्रदेश के उत्तर-पछिम इलाके मैं अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग की संख्या अधिक है । बसपा इस इलाके मैं अपनी उपस्थिति दर्ग करती आ रही है। उसकी असली पहचान तो जनजातीय छेत्र मैं होनी है । यहाँ अभी तक जनजातीय वर्ग का कांग्रेस से मोह नही टुटा है । इस इलाके मैं ब्रह्मण एस हालत मैं नही है की वः माया के वोट बैंक से मिलकर उसे सत्ता तक पहुँचा सके । इसे मैं मध्यप्रदेश मैं माया अकेले ब्राह्मणों के बूते नही रह सकती हैं । सम्भव है की वः अपना प्रतिनिधि इलाके के बहुसंख्यक वर्ग से ही चुने । यह ब्रह्मण , ठाकुर ,बनिया या फिर कोई भी हो सकता है । यूपी मैं उनहोने इस फार्मूले को अपनाने का मन तभी बना लिया था जब भाजपा ने दूसरी बार उनकी सरकार गिराई थी । माया और उनके साथियों ने तभी सीधे जनता के बीच जाकर गठबंधन करने की बात कही थी। इस अब्सर को वहाँ ब्राह्मणों ने पहले पकड़ा । यूपी के ब्राह्मणों का मध्य प्रदेश मैं सम्बन्ध हैं । रोटी बेटी के सम्बन्ध। सत्ता के इस खेल मैं इन संबंधों के जरिये भी अवसर लपकने की कवायद चल रही है इस मामले मैं मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्त्ता और राजनीत मैं दखल रखने वाले मेरे एक मित्र की टिप्पणी मायने रखती है। जब इस से मायावती के इस जादू के बारे मैं पूछा टू उसका कहना था की प्रदेश मैं इन दिनों सभी पंडितो मी ख़ुद को सबसे बड़ा दलित साबित करने की होड़ लगी हुई है । जब की मेरे मित्र का कहना था की मायाबती की पार्टी को मप मैं यूपी सी सफलता नही मिलने वाली है । वह इसके कारण भी गिनता है । पहला तो यह की यूपी का ब्रह्मण ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा था । उसे न तो बीजेपी मैं जमीन दिख रही थी और न ही यादवों के बीच सम्मान । उन्हें ये सम्मान दलितों मैं दिखाई दिया । मप के ब्राह्मणों के सामने इस तरह के हालत नही हैं । यहाँ जातीय उन्माद की हालत भी वैसी नही है। तीसरे प्रदेश का वोटर अभी दो पार्टियों से इतर विकल्प की तलाश मैं नही है । मायावती के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भले ही उन्हें मप की सत्ता न दिला पाई लेकिन इतना तय है की उसने इस प्रदेश की उच्च जाती के मुंच और पूँछ के बल खोल दिए हैं । जातिवाद के उन्मादी अब बेशर्म तरीके से ही ख़ुद को बडा कह सकते हैं । माया के जातिवादी राजनेतिक घोल ने वो कर दिखाया है जो कभी अम्बेडकर और बुध नही कर सके । सत्ता की सस्ती डगर पर चलने को आतुर सवर्ण जाती के दिग्गजों के बीच आज ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकरवादी साबित करने की होड़ लगी हुई है । यह सामाजिक बदलाव है । कल तक जिसे अचुत मन आज उसकी बराबरी करने की आतुरता। यह सत्ता का जादू हो सकता है लेकिन इस जादू ने जातीय दर्प की सच्चाई की पोल तो खोल ही दी है।

Tuesday, 11 March 2008

वो दिन था




वो दिन था , वो समय था ,
हम थे और तुम थे ,
और था एक अजीब सा अहसास ,
और आज वो समय बीत चुका है ,
अब न हम है , और न तुम हो
और न ही है वो अहसास,
सोचता हूँ तो खोजाता हूँ उस समय मैं,
क्या वो समय फिर लौट कर वापस आयेगा ,
जिस समय को हम पल -पल जिया करते थे ,
बस अब एक ही तमन्ना है . की कास वो समय आए .
और उस समय मी हम और तुम फिर समाये .
इसे मजाक न समझना ये दिल की आवाज है
आपका प्रवीण

Wednesday, 27 February 2008

गाली का संगीत

वैसे बुरी नहीं है गाली। इसका अपना ही संगीत है अपनी ताल। यह तो सुनने वाले पर है की वह कितने सप्तक गह सकता है, झेल लेता है समझ सकता है। पहले बात गाली के संगीत की। गा - ली यानी जिसे गाया जा सकता हो और उसमे संगीत , धुन न हो भला कैसे संभव है। तो गाली और संगीत में वही है जो ताल और लात में। ताल बिन संगीत कैसा और लात बिना गाली का मजा आ ही नहीं सकता। ताल में बस शब्द बदलिए और देखिए चमत्कार लात हाजिर। तो शुरू रहिये ताल और लात के सुखद समायोजन में। भगवान आप का भला करेगा। जीवन को ताल दे न दे लात जरूर देगा।

Monday, 25 February 2008

बदलो हथियार

तो जरूरी चीज हैं ताकत। लड़ सकने की ichachha का स्केल। सवाल यह हैं कि हमारी ladai क्या हैं और उसके औजार क्या होंगे । उसके निशाने पर कौन हैं। न न न ..... यह नहीं कह सकते हैं कि हम नहीं लड़ते। नहीं लड़ते तो यह गाली गलौज क्यों, यह गुस्सा क्यों, यह भड़ास क्यों। तो हमारे हथियार कुछ भी हो सकते हैं लेकिन गाली गलौज तो कतई नही। chuk जाने कि निशानी हैं गाली। अपने ही पर खीजने का क्रोध तत्त्व। चलो, गाली भी दिए देते हैं लेकिन क्या उससे गाली देने वाले का कुछ नहीं jata हैं। गाली देते हुए वह कहीं गहरे छिजता नहीं, खाली नहीं होता इस प्रक्रिया में एक बड़ी चीज जाती हैं और वह हैं उर्जा , गुस्से की taap। इसी ताप को तो बचाने की जरूरत है। आख़िर इसी ताप का तो संग्रह हमारी ताकत में ढलता है। एक मानसिक दृढ़ता , हमले सहने की क्षमता इसी ताप से पैदा होती है। तो हम गाली गलौज नहीं करेंगे। इसका कोई यह मतलब कदापि न लगाएं की हमें गाली नहीं आती, कि हम बचाव के रास्ते तलाश रहें हैं, कि हम लड़ना नहीं चाहते। हम लडेंगे, उन सभी सवालों से जिनके कश्मकश से आप हम यहाँ हैं, लेकिन हमारी धारणा पलायन की कतई नहीं है। हम व्यूह में रहकर उसके पेंच खोलने कि कला सीखना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि सहने की ताकत। हम जानते हैं कि कुछ लोग इस पर टिप्पणी भी देंगे कि ................ में घुसे तुम्हारी फिलासफी तुमसे किसने कहा कि यहाँ आकर .......... मराओ । जान लीजिये - मैं बीहडी हूँ। मुरैना से लेकर औरैया तक मैंने चम्बल के बीहड़ को देखा है, उनमे घूमा हूँ, रातें बिताई है, उन्हें जिया है। इसलिए लड़ने कि कला मुझे आती है। यह बानी कि रवानी है। मगर वैसे नहीं जैसे कुछ लोग ब्लॉग पर लीद कर रहें हैं। इस तरह हगने का क्या फायदा। अपने ही आप पीठ ठोकना और इस अकड़ से घूमना कि हम किसी कि नहीं मानते। ........... तो घूमिये जनाब। मगर जरा ठहर जाइए, आप में से कई मेरे अग्रज हैं । वे भी जानते हैं कि बदलाव ऐसे नहीं आते मगर वह इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। या फिर यह कहें कि कुंठित मन उनको ऐसा करने से रोकता है। सो कुंठा में तो गालियाँ ही निकलेंगी। अगर 'पाश' की कविता में कहें ---- ओ, अपनी प्रेमिकाओं को प्रेम पत्र लिखने वालों, अगर तुम्हारी कलम की नोंक बांझ है तो कृपया कागजों पर गर्भपात न करें ।

Thursday, 21 February 2008

कुछ अपने बारे में

लो, मैं हाजिर हूँ। बहुत दिन से कोशिश कर रहा था आपके बीच आने की। यह तकनीकि ज्ञान की कमी थी जिसने अब तक मुझे रोके रखा। कोशिश रंग लाई और में बनने में सफल रहा। कुकुरमुत्ता की तरह मैं आपके बीच उग आया हूँ। न न न... साधारण चीज नही है कुकुरमुत्ता, जीवन की शक्ति है, पत्थर का सीना फाड़ने की ताकत है कुकुरमुत्ता। निराला का प्रिय विषय है कुकुरमुत्ता। मैं ऐसा कोई दावा नही करता। मेरी पत्रकारिता की यात्रा में मेरे ऊपर दो यशवंत का असर है। पहले यशवंत व्यास और दूसरे यशवंत सिंह । व्यास जी मुझे जयपुर में मिले, तब मैं दैनिक भास्कर में था और व्यास जी दैनिक नवज्योति के संपादक थे। यशवंत सिंह मेरे लिए एक मायने में द्रोणाचार्य है। उन्ही की हस्तलिपि से मैं पेज मेकिंग सीख सका। शायद ये बात यशवंत सिंह को भी नही मालूम । मैं जब अमर उजाला कानपुर पहुँचा वे जा चुके थे। मिला उनका लिखा एक कागज । कैसे सीखें पेज बनाना । यहाँ बस इतना ही बाकी फ़िर कभी।